कुमारी सैलजा के फरमान से उत्तराखंड कांग्रेस में घमासान, साख बचाएं, संगठन चलाएं या कुर्सी छोड़ें

देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में इस वक्त जो सियासी तूफान चल रहा है, उसने पार्टी के भीतर अजीब कश्मकश पैदा कर दी है। कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी को लेकर पिछले आठ माह से ऊहापोह बना है।

अब राष्ट्रीय महासचिव एवं उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा के फरमान ने पार्टी के उन जिलाध्यक्षों की नींद उड़ा दी है, जो लंबे समय से विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार करने में लगे हैं। वे पसोपेश में हैं कि साख बचाएं, संगठन चलाएं या फिर टिकट के लिए कुर्सी छोड़ें। कांग्रेस संगठन में मची खलबली के बीच इसे लेकर अब दबी जुबान में विरोध के सुर भी उठने लगे हैं।

चुनौतियों का पहाड़

पिछले 10 साल से उत्तराखंड की सत्ता में वापसी को छटपटा रही कांग्रेस ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कमर तो कसी, लेकिन प्रदेश कांग्रेस में धड़ेबाजी, अंतर्कलह ने इस राह में चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। उस पर तुर्रा यह कि लगभग आठ माह पहले प्रदेश अध्यक्ष के पद पर पूर्व विधायक गणेश गोदियाल की ताजपोशी के बावजूद अभी तक उनकी प्रांतीय कार्यकारिणी को अनुमोदन का इंतजार है।

ऐसे में कौन प्रदेश संगठन में आएगा, कौन बाहर जाएगा, इसे लेकर असमंजस बना हुआ है। यद्यपि कहा जा रहा है कि प्रदेश कार्यकारिणी जल्द घोषित होगी, लेकिन यह कब तक होगी नहीं मालूम।

इस बीच कांग्रेस हाईकमान ने उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा को राज्य में सक्रिय किया। माहभर के भीतर हाल में हुए उनके राज्य के तीन दौरे इसका उदाहरण हैं, लेकिन अब सैलजा के एक फरमान ने कांग्रेस संगठन में बेचैनी बढ़ा दी है। सप्ताहभर पहले राज्य के दौरे पर आईं सैलजा ने पार्टी जिलाध्यक्षों की बैठक में साफ निर्देश दिए थे कि जिसे चुनाव लड़ना है, वह जिलाध्यक्ष की कुर्सी छोड़ दे। इसके बाद से कांग्रेस संगठन में खलबली मची है

न केवल चुनावी तैयारियों में जुटे जिलाध्यक्षों बल्कि अन्य नेता भी इससे बेचैन हैं। वे दबी जुबान में उत्तराखंड प्रभारी के निर्णय को पार्टीजनों का मनोबल तोड़ने वाला कदम करार दे रहे हैं। इस सिलसिले में कुछ नेताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र भी भेजे हैं। देखने वाली बात होगी कि कांग्रेस हाईकमान इसे लेकर क्या निर्णय लेता है

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