देहरादून की हवा में मौत के कण… पानी में जहर… बढ़े कैंसर के मरीज

देहरादून। जिस दून घाटी को कभी स्वच्छ हवा, मीठे पानी और सेहतमंद जीवन के लिए जाना जाता था, आज वही घाटी जहरीली हवा और प्रदूषित जल के शिकंजे में फंसती जा रही है।

सवाल केवल बढ़ते प्रदूषण का नहीं, बल्कि उस खामोश महामारी का है, जो धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी निगल रही है। क्या दून अब कैंसर की ओर बढ़ रहा है? विशेषज्ञ भले ही सीधे तौर पर प्रदूषण को कैंसर का अकेला कारण न मानें, मगर वैज्ञानिक अध्ययन और अस्पतालों के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि दून की बिगड़ती हवा और दूषित पानी शरीर में धीरे-धीरे जहर घोल रहे हैं।

प्रदूषण को कैंसर का अकेला कारण न मानें

देहरादून में कैंसर रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दून मेडिकल कालेज, एम्स ऋषिकेश और निजी अस्पतालों में हर साल कैंसर मरीजों का दबाव बढ़ रहा है। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च और विश्व स्वास्थ्य संगठन भी वायु प्रदूषण को फेफड़ों के कैंसर का बड़ा कारण मान चुके हैं।

तंबाकू, खानपान के साथ ही अनियमित जीवनशैली भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन अब प्रदूषण एक ऐसा दुश्मन बन चुका है, जिससे बचना आसान नहीं है। अकेले दून अस्पताल में हर माह कैंसर रोग के 100 से अधिक मरीज आ रहे। एक कारण दून में खड़े हो रहे कंक्रीट के जंगल भी हैं।

वर्ष 2000 से 2026 के बीच देहरादून का निर्मित क्षेत्र आठ गुना बढ़ गया। लाखों वाहन, धूल उड़ाते निर्माण कार्य, जंगलों की कटाई और कूड़ा जलाने की प्रवृत्ति ने दून को गैस चैंबर में बदलना शुरू कर दिया है। यहां घाटी की भौगोलिक स्थिति के कारण प्रदूषक तत्व लंबे समय तक वातावरण में फंसे रहते हैं।

हर सांस के साथ शरीर में पहुंच रहा जहर

दून की हवा अब पहाड़ों की ताजगी नहीं, बल्कि मौत के महीन कणों से भरी हुई है। जनवरी 2026 में शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 316 तक पहुंच गया। पीएम-2.5 का स्तर 329 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज हुआ, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुरक्षित मानक से कई गुना ज्यादा है।

पीएम-2.5 के ये सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों से रक्त में पहुंचते हैं व फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, ब्रेन स्ट्रोक व श्वसन रोगों का खतरा बढ़ाते हैं। दून मेडिकल कालेज के चिकित्सकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में श्वसन रोग व कैंसर से जुड़े मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।

नदियां बनीं नालियां, पानी में घुल रहा जहर

रिस्पना, बिंदाल और सुसवा जैसी नदियां अब सीवर लाइन में तब्दील हो चुकी हैं। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया व एमिटी विश्वविद्यालय के हालिया अध्ययन में सामने आया कि देहरादून की पांच प्रमुख नदियों के आसपास का 56 प्रतिशत क्षेत्र गंभीर पर्यावरणीय दबाव झेल रहा है।

सीवेज, रासायनिक अपशिष्ट व अतिक्रमण के कारण भूजल भी प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार दूषित पानी में मौजूद नाइट्रेट और भारी धातुएं लंबे समय तक शरीर में पहुंचें तो कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।

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