देहरादून। प्रदेश की राजधानी दून की सड़कों पर हर सुबह एक जैसा दृश्य दिखता है। लंबी कतारें, रेंगता ट्रैफिक, धुएं से भरी हवा और हार्न के शोर में फंसा आम आदमी।
दूसरी तरफ लाल-पीली बत्तियों और सरकारी वाहनों की अलग दुनिया चलती रहती है। लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईंधन बचत की अपील के बीच एक ऐसा सुझाव सामने आया है, जो सिर्फ तेल नहीं बचाएगा, बल्कि सिस्टम की सोच पर भी सीधा प्रहार करेगा, वह है सप्ताह में एक दिन सरकारी अफसर व कर्मचारी सार्वजनिक परिवहन से दफ्तर पहुंचें
यह सुझाव अब धीरे-धीरे ‘सिस्टम सुधार’ की बहस में बदल रहा है। वजह साफ है कि जो अफसर कभी बस स्टैंड पर खड़े नहीं होते, जिन्हें भीड़भरी बसों, विक्रम, आटो में सफर नहीं करना पड़ता, वे आखिरकार आम आदमी की सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी तकलीफ समझेंगे कैसे
दून में शुरू हो चुका है प्रयोग
दिलचस्प बात यह है कि यह सिर्फ कल्पना नहीं है। संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) देहरादून में पिछले साल पांच जून विश्व पर्यावरण दिवस से हर गुरुवार अधिकारी और कर्मचारी सार्वजनिक परिवहन से कार्यालय पहुंच रहे हैं। अब सवाल उठ रहा है कि जब सरकार के अधीन एक कार्यालय ””आरटीओ”” यह कर सकता है तो पूरा सरकारी सिस्टम क्यों नहीं
सरकार भी वही सफर करे, जो जनता करती है’
असल मुद्दा केवल पेट्रोल बचत नहीं है। मुद्दा यह है कि सरकार उस व्यवस्था को खुद महसूस करे, जिसे सुधारने के दावे रोज किए जाते हैं। एसडीसी फांउडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल पूछते हैं कि क्या कभी किसी बड़े अधिकारी ने सुबह आइएसबीटी से घंटाघर तक खड़े होकर विक्रम में सफर किया?
क्या किसी सचिव या अपर सचिव स्तर के अफसर या आइपीएस ने आफिस टाइम में राजपुर रोड का जाम बस की खिड़की से देखा? क्या किसी विभागाध्यक्ष ने भीड़भरी बस में जगह न मिलने की परेशानी महसूस की? यही वजह है कि यह सुझाव अब ‘जनता बनाम सिस्टम’ की बहस में बदलता दिख रहा है।
एक दिन में दिख सकता है बड़ा असर
यदि प्रदेशभर के हजारों सरकारी कर्मचारी सप्ताह में सिर्फ एक दिन भी निजी वाहन छोड़ दें तो सड़कों पर हजारों वाहन कम होंगे और पेट्रोल-डीजल की खपत भी घटेगी। इसके साथ ही ट्रैफिक दबाव कम होगा और प्रदूषण में राहत मिलेगी। और सबसे अहम यह कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को लेकर सिस्टम की जवाबदेही बढ़ेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस दिन अफसर खुद बस में सफर करेंगे, उसी दिन बसों की हालत सुधारने की फाइलें भी तेजी से चलेंगी।
‘वीआइपी सड़क संस्कृति’ पर भी चोट
दून में ट्रैफिक का एक बड़ा सच यह भी है कि आम आदमी जाम में फंसता है व वीआइपी काफिले निकल जाते हैं। ऐसे में यदि सरकार खुद सार्वजनिक परिवहन अपनाती है तो यह सिर्फ पर्यावरणीय कदम नहीं होगा, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संदेश भी होगा कि सड़क सबकी बराबर है।
सवाल सरकार के सामने
क्या सरकार खुद सार्वजनिक परिवहन पर भरोसा जताने को तैयार है?
क्या अफसर वही सफर करेंगे, जो रोज आम आदमी करता है?
क्या ‘एक दिन बस में सरकार’ उत्तराखंड में नई प्रशासनिक संस्कृति की शुरुआत बन सकता है?
या फिर यह सुझाव भी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा?