देहरादून। रायवाला थानाक्षेत्र के एक स्कूल में पांचवीं की छात्रा को अश्लील वीडियो दिखाकर दुष्कर्म के मामले में पुलिस की एक बड़ी चूक से आरोपी शिक्षक मनोज गुरानी साक्ष्यों के आभाव में बरी हो गया। आरोपित पर जिस मोबाइल से अश्लील वीडियो दिखाने का आरोप था, पुलिस की महिला विवेचक ने उस मोबाइल को फारेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा।
विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) अर्चना सागर की अदालत ने कहा है कि अभियोजन पक्ष दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य पेश नहीं कर सका। मामले में मुख्य गवाहों के मुकरने की सूरत में मोबाइल अहम सबूत हो सकता था। दूसरी ओर मामले में स्कूल के प्रधानाचार्य की गवाही अहम रही।
प्रधानाचार्य ने अदालत में पुष्टि की कि घटना के बाद छात्रा के माता-पिता स्कूल आए थे और उन्होंने शिक्षक मनोज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, जिरह में यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने अपनी आंखों से शिक्षक को कोई गलत हरकत करते नहीं देखा और न ही स्कूल के किसी अन्य कर्मचारी या किसी अन्य ने ऐसा कुछ देखा
सुनवाई में मुकर गए अहम गवाह
अदालती आदेश के अनुसार, मामले में विवेचक एसआई प्रीति ने उस मोबाइल फोन को बरामद या जब्त नहीं किया, जिसके जरिए छात्रा को अश्लील वीडियो दिखाने का आरोप था। स्कूल में कोई सीसीटीवी कैमरा भी नहीं था। कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, जब मामला डिजिटल कंटेंट से जुड़ा हो, तो मोबाइल की फारेंसिक रिपोर्ट सबसे बड़ा सबूत होती है।
मामले में मुख्य गवाह के तौर पर पीड़िता और उसकी माता अदालत में अपने पूर्व बयान से मुकर गए, ऐसे में मोबाइल जब्त न होने के कारण अभियोजन के पास शिक्षक को दोषी ठहराने के लिए कोई वैज्ञानिक आधार शेष नहीं रह गया। सात मई 2024 को दर्ज एफआईआर में पुलिस ने धारा 354, 376 और पोक्सो अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।