उपदेश देने वाली ”खाकी” देहरादून में खुद फैला रही प्रदूषण, बिना पीयूसीसी के दौड़ रही 320 गाड़ियां

देहरादून। सड़कों पर प्रदूषण के नाम पर आम लोगों के वाहनों का चालान काटने वाली पुलिस यानी ””खाकी”” खुद कानून की सबसे बड़ी उल्लंघनकर्ता बनकर सामने आई है। यह हम नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़े इसकी गवाही दे रहे।

दरअसल, जब आरटीओ (प्रशासन) संदीप सैनी ने ””वाहन साफ्टवेयर”” में सरकारी विभागों के वाहनों की प्रदूषण वैधता प्रमाणपत्र की जांच की तो पता चला कि राजधानी में 731 सरकारी वाहन (दोपहिया से लेकर भारी वाहन तक) बिना वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसीसी) के सड़कों पर दौड़ रहे हैं।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि इनमें सर्वाधिक 320 वाहन पुलिस विभाग के हैं, जो बिना वैध पीयूसीसी के पाए गए। यानी जिन पर यातायात नियमों के पालन की जिम्मेदारी है, वही नियमों को सबसे ज्यादा तोड़ते नजर आए। इसके बाद पशुपालन विभाग के 57, वन विभाग और स्वास्थ्य महानिदेशालय के 38-38 वाहन, कार्यकारी अभियंता श्रेणी के 22 और राज्य कर विभाग के सात वाहन नियम विरुद्ध संचालन करते पाए गए।

इसके अलावा जीएसटी, आबकारी, राज्य संपत्ति विभाग, राजस्व बोर्ड और जिला प्रशासन जैसे अहम विभागों के वाहन भी वैध प्रमाणपत्र के बिना दौड़ने वालों की सूची में शामिल हैं। फिलहाल इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रदूषण नियंत्रण के दावों में सबसे बड़ा ””प्रदूषक”” खुद सरकारी व्यवस्था है।

जनता पर सख्ती, सरकारी को छूट

परिवहन नियमों के मुताबिक नियम 115(7) के तहत प्रत्येक वाहन के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र अनिवार्य है।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 190(2) साफ कहती है कि पहली बार पकड़े जाने पर 2,500 रुपये जुर्माना और चालक का लाइसेंस तीन माह के लिए निलंबित किया जाएगा, जबकि दोबारा यही अपराध पर 5,000 रुपये का जुर्माना और फिर तीन माह का लाइसेंस निलंबन तय है। इसके बावजूद सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन धाराओं का डर सिर्फ आम नागरिक के लिए है? सरकारी वाहन बिना पीयूसीसी कैसे चलते रहे और किसी की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?

थमाया नोटिस, सात दिन की मोहलत

परिवहन विभाग ने सभी संबंधित विभागों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि जो वाहन संचालन योग्य हैं और वर्तमान में उपयोग में हैं, वह सात दिवस के भीतर प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाएं। निर्धारित समयसीमा के बाद ऐसे वाहनों का चालान किया जाएगा, जो बिना प्रदूषण प्रमाणपत्र या फिर बिना टैक्स दौड़ रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब सरकारी तंत्र की लापरवाही उजागर हुई हो।

सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ कागजी चेतावनी बनकर रह जाएगी, या फिर सरकारी विभागों पर भी वही कानून लागू होगा, जो आम आदमी पर सख्ती से थोपा जाता है।

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