वाहनों की रेलमपेल से बिगड़ रही Dehradun की हवा की सेहत, उपचार की दरकार

देहरादून। कभी शांत, हरी-भरी वादियों और ताजी आबोहवा के लिए मशहूर रही दून घाटी में बढ़ती आबादी, अंधाधुंध निर्माण, वाहनों रेलमपेल और फैलते उद्योग देहरादून की आबोहवा की सेहत बिगाड़ रहे हैं। हालांकि, अब भी दून की हवा कई अन्य बड़े शहरों की तुलना में बेहतर है, लेकिन स्वच्छ वायु के लिए नगर निगम को गंभीर प्रयास करने होंगे।

विकास की अंधी दौड़ में हरियाली तेजी से घट रही है, और हवा में घुलते प्रदूषक कण (पीएम-2.5 और पीएम-10) अब ज्यादा समय तक तैरते रहते हैं। ग्रीष्म और शीत ऋतु में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो दून की आबोहवा भी दिल्ली जैसी दमघोंटू हो जाएगी। दून की हवा में सबसे बड़ा जहर वाहनों से निकलने वाला धुआं और सड़कों पर उड़ती धूल है।

इसके अलावा, निर्माण कार्यों की धूल, कूड़ा जलाना और कोयले का इस्तेमाल भी प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहे हैं। पिछले वर्ष आइआइटी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी दो वर्षीय अध्ययन ने दून की हवा की असलियत सामने रखी। जिसमें पाया गया कि दून में रोजाना भारी मात्रा में प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है। पीएम-2.5 और पीएम-10 के खतरनाक स्तर से सांस की बीमारियां, अस्थमा और दिल की समस्याएं तेजी से बढ़ने का खतरा है।

अगर सिर्फ वाहनों के धुएं, निर्माण कार्यों की धूल और सड़क किनारे उड़ते कणों पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो दून की हवा काफी हद तक साफ हो सकती है। हालांकि, केंद्र सरकार के स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत अब नगर निगम की ओर से वायु प्रदूषण रोकने को सराहनीय कदम उठाए जा रहे हैं। वहीं, राज्य सरकार भी इस ओर गंभीर नजर आती है।

तो मुरादाबाद, नोयडा में हवा दून से शुद्ध

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की रिपोर्ट में तीन लाख से 10 लाख आबादी के शहरों की श्रेणी में दून की रैकिंग 19वीं रही है। हालांकि, यह पिछले वर्ष की तुलना में दोगुना उछाल है। लेकिन, अब भी हम शीर्ष 10 में शामिल नहीं हो पाए हैं।

नजदीकी शहरों की बात करें तो मुरादाबाद, बरेली और नोयडा भी दून से काफी आगे हैं। मुरादाबाद को 198.5 अंकों के साथ दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है। बरेली को 189.5 अंकों के साथ सातवें और नोयडा 184.2 अंकों के साथ नौवें स्थान पर है। जिसका मतलब है कि इन शहरों की हवा दून से शुद्ध है।

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