देहरादून। Doon Hospital Mazar: दून अस्पताल परिसर में फर्जी मजार कब बनी, किसने बनवाई, इसके चढ़ावे से कौन फला-फूला। इन प्रश्नों के उत्तर अभी तक की प्रशासनिक जांच में नहीं मिले हैं। हो सकता है भविष्य में यह कुहासा छंटे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि मजार का दिनों-दिन आकार बढ़ता रहा, फिर जिम्मेदार क्यों सोते रहे।
विशेषकर स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता चिंता का विषय है। जिस जगह यह फर्जी मजार बनी थी, वहां पर चौबीसों घंटे चहल-पहल रहती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी रोजाना इसी मजार के आगे से गुजरते रहे हैं। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि उन्हें वाकई में मजार बनती नहीं दिखी या उन्होंने इसे देखना नहीं चाहा। ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद कुछ इसी तरह के प्रश्न अब स्वास्थ्य विभाग की तरफ उठ रहे हैं।
यह कब बन गई और विभाग को पता नहीं चला
प्रशासनिक जांच में स्वास्थ्य विभाग ने यह बात आसानी से कह दी कि उनके रिकार्ड में इस स्थान पर कभी मजार थी ही नहीं। लेकिन, यह बात उनसे किसी ने नहीं पूछी कि जब यहां पर मजार नहीं थी तो यह कब बन गई और विभाग को इसका पता क्यों नहीं चला।
लगभग 50 साल पहले इसका आकार काफी छोटा था, इसके बाद के वक्फे में इसका फैलाव बढ़ता गया। कुछ सालों पहले इसे भव्य रूप दिया गया। बाकायदा महीनों इस पर काम चला, पर स्वास्थ्य विभाग को तब भी यह नहीं दिखा। यह दीगर बात है कि इन प्रश्नों के उत्तर में स्वास्थ्य विभाग के वर्तमान अधिकारियों में से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है, हां वह इतना जरूर स्वीकार करते हैं कि यह मजार स्वास्थ्य विभाग की जमीन पर अवैध रूप से बनी थी।
दून अस्पताल की शुरुआत वर्ष 1854 में नगर पालिका के अधीन डिस्पेंसरी के रूप में हुई थी। इससे समझा जा सकता है कि अस्पताल का इतिहास कितना पुराना है। ऐसे में जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर सिटी मजिस्ट्रेट प्रत्यूष सिंह ने अस्पताल प्रशासन को पत्र भेजकर मजार के अभिलेख मांगे तो उत्तर में अस्पताल ने स्पष्ट किया था कि उनके रिकार्ड में मजार का जिक्र नहीं है।
मजार के अभिलेख देखने के लिए अस्पताल के अधिकारियों ने पुरानी ड्राइंग का भी परीक्षण किया। यहां भी मजार का अस्तित्व नहीं पाया गया। इससे साफ है कि मजार बाद भी कभी बनाई गई होगी। लिहाजा, अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को करीब चार वर्ष पहले शिकायत के संज्ञान में आते ही इसे हटाने की कार्रवाई शुरू कर देनी चाहिए थी। यदि ऐसा कर लिया जाता तो अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर अब सवाल खड़े नहीं होते।
मरीजों को होती थी परेशानी
अस्पताल परिसर में फर्जी मजार की मौजूदगी से मरीजों को भी परेशानी होती थी। आवाजाही में भी दिक्कत आती थी। मरीज और उनके तीमारदार अक्सर आरोप लगाते थे कि मजार का खादिम वार्डों में जाकर स्वस्थ होने के लिए मजार में मत्था टेकने को कहता था। बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग ने कभी मजार को हटाने की पहल की।
मरीजों को स्वस्थ होने के लिए मजार का रुख कराता था खादिम
दून अस्पताल परिसर में बनी फर्जी मजार में प्रतिदिन बड़ी संख्या में चादर व चढ़ावा चढ़ाया जाता था। आरोप है कि फर्जी मजार का खादिम वार्डों में जाकर तीमारदारों से मिलता था और मरीजों के स्वस्थ होने के लिए यहां मत्था टेकने को कहता था। परेशान मरीजों के तीमारदार स्वास्थ्य की चिंता को देखते हुए फर्जी मजार में मत्था टेकने के लिए पहुंचते थे।
बताया जा रहा है कि कुछ लोग अपनी श्रद्धा से चढ़ावा चढ़ाते थे, जबकि कुछ लोगों को इरादतन फर्जी मजार का रुख कराया जाता था। फर्जी मजार में चादर व चढ़ावा चढ़ाने और अगरबत्ती जलाने वालों में सभी धर्मों के लोग शामिल थे। हर गुरुवार को मरीजों के साथ बाहर से आने वाले लोग भी कतार में लगकर मत्था टेकते थे।
फर्जी मजार के कारण दून अस्पताल के बाहर अवैध तरीके से चादर व अन्य सामान बेचने वालों की ठेलियां भी लगी रहती थीं। नगर निगम की टीम ने कई बार इन पर कार्रवाई भी की।