देहरादून। Golden Card Scheme: प्रदेश के कर्मचारियों और पेंशनरों व उनके आश्रितों के लिए गोल्डन कार्ड से इलाज पर संकट खड़ा हो गया है। राज्य सरकार स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पतालों की देनदारी 100 करोड़ से अधिक हो गई है। जिस कारण तमाम बड़े अस्पताल इलाज करने से हाथ खड़े कर रहे हैं।
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव से दखल की मांग की है। राज्य सरकार से मांग की है कि वह अपने स्तर से पूर्व की भांति इस योजना में चिकित्सा प्रतिपूर्ति को बजट स्वीकृत करते हुए, राज्य कार्मिकों के चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लंबित देयकों का तत्काल भुगतान सुनिश्चित कराए। इस योजना को और अधिक सुदृढ बनाए जाने का प्रयास करे।
कुप्रबंधन का शिकार रही है योजना
परिषद के प्रदेश अध्यक्ष अरुण पांंडेय ने कहा कि यह योजना कुप्रबंधन का शिकार रही है। जिससे राज्य कार्मिकों का इसका उचित लाभ प्राप्त नहीं हो पाया है। जिस कारण राज्य कार्मिकों एवं पेंशनरों को कोर्ट की शरण में जाने को बाध्य होना पड़ा। वहीं वर्तमान में यह योजना सरकार की अनदेखी का शिकार है।
पांडेय ने कहा कि पूर्व में अपर मुख्य सचिव कार्मिक की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह मांग रखी गई थी कि उक्त योजना अंशदान आधारित है और इसमें कार्मिक चिकित्सा प्रतिपूर्ति के भी हकदार हैं।
सरकार को कार्मिकों के अंशदान के अतिरिक्त चिकित्सा प्रतिपूर्ति पर आने वाले अतिरिक्त व्यय को वहन करना चाहिए। जिस पर तत्कालीन अपर मुख्य सचिव व वर्तमान मुख्य सचिव ने अपनीं सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की थी। पर सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में इसके लिए कोई धनराशि नहीं रखी है, जो कि घोर आपत्तिजनक है। इस कारण कार्मिकों के उपचार में हुए व्यय के देयको का भुगतान न होने के कारण देश- प्रदेश के बड़े अस्पतालों ने योजना से हाथ खींच लिए हैं।
उपचार का खर्च बढ़ा चढ़ाकर दिखा रहे अस्पताल
परिषद के प्रदेश महामंत्री शक्ति प्रसाद भट्ट ने यह आरोप लगाया कि कई अस्पताल उपचार में खर्च को बढ़ा चढाकर दिखा रहे हैं। इससे भी व्ययभार अप्रत्याशित रुप से बढ गया है। अपर मुख्य सचिव कार्मिक की अध्यक्षता में पूर्व में हुई बैठक में यह भी तय हुआ था कि यह समीक्षा की जाए कि अचानक से यह वृद्धि कैसे हुई। पर इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के प्रबंधन को समय-समय पर अवगत कराया गया कि कतिपय अस्पतालो की ओवर बिलिग की शिकायत है। ऐसे अस्पतालों के फर्जी देयकों के भुगतान पर रोक लगाई जाए।
कहा कि कार्मिकों के अंशदान मात्र से ही उनका उपचार कराया जा रहा है, जबकि पूर्व में बगैर अंशदान ही राज्य कार्मिकों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति का भुगतान किया जाता था। इससे यह प्रतीत होता है कि सरकार अपनी ओर से कोई अंशदान उक्त योजना के लिए नहीं देना चाहती है।