देहरादून। Dehradun Metro Project: जिस शख्स ने दून में मेट्रो के सपने को साकार करने लिए दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन की सेवा के बाद उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन का दामन थामा, वह अब जनवरी 2025 में रिटायर हो रहे हैं।
रिटायर होना सामान्य बात है, लेकिन उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन के लिए यह किसी भी दशा में सामान्य नहीं है। क्योंकि, जब प्रबंध निदेशक के रूप में जितेंद्र त्यागी ने पदभार ग्रहण किया था, तब इस कार्यालय का गठन ही हुआ था।
हालांकि, कुछ ही माह में मेट्रो की डीपीआर बनाने के बाद भी जब सरकार का रवैया सुस्त रहा तो उन्होंने अपना इस्तीफा सरकार को सौंप दिया था। तब त्रिवेंद्र सरकार में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने उन्हें मनाया और गंभीरता के साथ मेट्रो परियोजना का आगे बढ़ने का भरोसा दिलाकर उन्हें कम जारी रखने के लिए मना लिया था।
मेट्रो सफर अभी भी भौतिक प्रगति के रूप में शून्य
तब से अब तक सात साल का सफर हो चुका है, लेकिन मेट्रो सफर अभी भी भौतिक प्रगति के रूप में शून्य है। इस दौरान मेट्रो के अलग अलग रूप पर कसरत करने के बाद अंतिम रूप से नियो मेट्रो की डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार की गई। अब इतिहास ने खुद को फिर दोहराया है। इस बार प्रबंध निदेशक (एमडी) जितेंद्र त्यागी सामान्य रूप से रिटायर हो रहे हैं।
गंभीर यह कि मेट्रो प्रोजेक्ट पर सुस्त नजर आ रही सरकारी मशीनरी ने अभी जितेंद्र त्यागी के सेवा विस्तार की दिशा में भी कदम नहीं बढ़ाए हैं। न ही परियोजना को लेकर कोई धरातलीय प्रगति दिख रही है। जितेंद्र त्यागी ही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने सरकार की मंशा को धरातल पर उतारने के लिए दिल्ली से देहरादून की तरफ रुख किया। उन्होंने परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए हरसंभव जतन किए।
आठ जनवरी 2022 को नियो मेट्रो की डीपीआर को राज्य कैबिनेट से पास करने के बाद 12 जनवरी को केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए भेज दिया गया था। तब से अब तक मेट्रो का भविष्य फाइलों में ही कैद है। इससे दून की सड़कों पर निजी वाहनों का दबाव कम करने और जाम की समस्या पर अंकुश लगाने की एक महत्वकांक्षी परियोजना के भविष्य पर शंका गहराने लगी है।
80 करोड़ के खर्च पर मंत्री नाराज
हाल में मेट्रो रेल परियोजना की समीक्षा बैठक में जब आवास एवं शहरी विकास मंत्री ने खर्च का आंकड़ा देखा तो उनका मूड उखड़ गया। उन्होंने कहा कि मेट्रो परियोजना पर अब तक 80 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जबकि भौतिक प्रगति शून्य है। उन्होंने कहा कि परियोजना को लेकर सरकार गंभीर है और इसके बाद भी प्रगति बेहद निराशाजनक है।
अगस्त माह से वित्त विभाग में अटकी फाइल
केंद्र सरकार से निराशा हाथ लगने के बाद राज्य सरकार ने तय किया था कि मेट्रो के लिए खर्च अपने स्रोतों से वहन किया जाएगा। इसके लिए पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (पीआइबी) के समक्ष प्रस्ताव को रखने पर सहमति बनी। अगस्त माह में पीआइबी के समक्ष प्रस्तुतीकरण भी दिया गया। ताकि वित्त विभाग की सभी शंका का समाधान कर दिया जाए।
जिसमें कहा गया कि बजट का 40 प्रतिशत भाग सरकार वहन करेगी और 60 प्रतिशत का इंतजाम ऋण के माध्यम से किया जाएगा। उस बैठक में कंसल्टेंट कंपनी मैकेंजी कंपनी से डीपीआर का थर्ड पार्टी परीक्षण कराने का भी निर्णय लिया गया। लेकिन, परीक्षण पर अभी तस्वीर साफ नहीं की जा सकी और फाइल भी वित्त से आगे नहीं सरक पाई।
450 करोड़ रुपए से अधिक बढ़ी लागत
पूर्व में मेट्रो परियोजना की लागत 1852 करोड़ रुपए आंकी गई थी। अब साल दर साल बढ़ते इंतजार में लागत बढ़कर करीब 2303 करोड़ रुपए हो गई है। यही कारण है कि अधिकारी इतनी बड़ी परियोजना को लेकर निर्णय करने से कतरा रहे हैं।
यह हैं मेट्रो के प्रस्तावित स्टेशन
आइएसबीटी से गांधी पार्कः आइएसबीटी, सेवला कलां, आइटीआइ, लालपुल, चमनपुरी, पथरीबाग, रेलवे स्टेशन, कचहरी, घंटाघर, गांधी पार्क।
एफआरआइ से रायपुर: एफआरआइ, बल्लूपुर चौक, आइएमए ब्लड बैंक, दून स्कूल, मल्होत्रा बाजार, घंटाघर, सीसीएमसी, आराधर चौक, नेहरू कालोनी, विधानसभा, अपर बद्रीश कालोनी, अपर नत्थनपुर, आर्डिनेंस फैक्ट्री, हाथी खाना चौक और रायपुर।