देहरादून । Dehradun Air Pollution: शांत और स्वच्छ वातावरण के लिए जाना जाने वाला दून भी अब महानगरों की राह पर है। बढ़ी आबादी के साथ अंधाधुंध निर्माण, वाहन और उद्योगों का विस्तार दून की आबोहवा बिगाड़ रहे हैं। अनियंत्रित विकास के साथ ही दून में हरियाली भी घट रही है। ऐसे में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक कण अब ज्यादा समय तक हवा में तैरते रहते हैं।
खासकर ग्रीष्म और शीत के चरम पर होने के दौरान वायु प्रदूषण का स्तर भी शीर्ष पर पहुंच जाता है। भले ही केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय स्वच्छ वायु प्रोग्राम के तहत दून में भी आबोहवा को दूषित होने से बचाने के प्रयास किए तो किए जा रहे हैं, फिलहाल ये नाकाफी साबित हो रहे हैं। दून में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण वाहनों के धुएं और खुले में उड़ रही धूल-मिट्टी से ही होता है। कूड़ा जलाने और कोयला भी वायु प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं।
दून में दो वर्ष का अध्ययन किया गया।
दरअसल, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित आइआइटी की ओर से दून में दो वर्ष का अध्ययन किया गया। इस दौरान गर्मियों और सर्दियों में शहर में उत्सर्जित प्रदूषक कारकों की रिपोर्ट तैयार की गई। साथ ही उनके प्रभाव और रोकथाम के उपाय भी सुझाए गए।
इस रिपोर्ट के आधार पर वायु प्रदूषकों को चिह्नित किया गया है, ऐसे में उनकी रोकथाम या प्रभाव कम करने के लिए अब नगर निगम, एमडीडीए, आरटीओ, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आदि विभागों को अपने-अपने स्तर पर कार्य करने हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि दून में रोजाना लगभग कितना वायु प्रदूषण होता है।
साथ ही यह किन-किन कारकों से हो रहा है। पीएम-2.5 और पीएम-10 की स्थिति भी बताई गई है। दून में यदि वाहनों के धुएं और सड़कों की धूल के साथ ही निर्माण कार्यों की धूल को कम कर दिया जाए तो शहर की आबोहवा काफी हद तक स्वस्थ हो जाएगी। लेकिन, विभागों और आमजन की लापरवाही के कारण बढ़ रहे वायु प्रदूषण ने दून की आबोहवा को दमघोंटू की राह पर बढ़ा दिया है।
पीएम-2.5 स्वास्थ्य के लिए ज्यादा घातक
पीएम-10 और पीएम-2.5 अलग-अलग उत्सर्जन स्रोतों से निकलते हैं और इनकी रासायनिक संरचना भी अलग होती है। गैसोलीन, तेल, डीजल ईंधन या लकड़ी के दहन से निकलने वाले उत्सर्जन से बनने वाले कण पदार्थ पीएम-2.5 की श्रेणी में आते हैं।
वहीं, पीएम-10 में निर्माण स्थलों, लैंडफिल और कृषि, जंगल की आग और कूड़ा जलाने, औद्योगिक स्रोतों, खुले क्षेत्र व सड़कों से हवा में उड़ने वाली धूल, परागकण आदि शामिल होते हैं। 10 माइक्रोन या उससे कम व्यास वाले (पीएम10) प्रदूषण कण पदार्थ फेफड़ों में सांस के जरिये जा सकते हैं और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
हालांकि, पीएम-2.5 अधिक बारीक होने के कारण अधिक मात्रा में फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं और घातक साबित हो सकते हैं। सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड और कुछ कार्बनिक यौगिक, द्वितीयक अकार्बनिक आइरोसोल और काबर्न मोनो आक्साइड भी वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक हैं।
प्रदूषित वायु में ज्यादा समय तक रहने के गंभीर परिणाम
दून अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डा. अनुराग अग्रवाल के अनुसार, वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। पीएम-2.5 के अधिक समय तक संपर्क में रहने से हृदय व फेफड़ों से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।
ब्रोंकाइटिस, अस्थमा के दौरे, श्वसन संबंधी समस्याएं होने का खतरा रहता है। ये प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव मुख्य रूप से शिशुओं, बच्चों और पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे वयस्कों के लिए घातक होते हैं। पीएम-10 के अधिक संपर्क में रहने से भी मुख्य रूप से अस्थमा और क्रोनिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) समेत अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।