देहरादून। दून के सबसे व्यस्ततम और यातायात दबाव के लिहाज से पूरे दिन जाम से पैक रहने वाले सहारनपुर रोड, मातावाला बाग और आढ़त बाजार में अगले एक साल के भीतर यातायात का दबाव आधा रह जाएगा।
खासकर, मातावाला बाग से सहानपुर चौक-आढ़त बाजार-रेलवे स्टेशन-प्रिंस चौक तक लगने वाले जाम से आमजन को निजात मिल जाएगी। इस मार्ग का यातायात दबाव कम करने के लिए केंद्र सरकार व राज्य सरकार के सहयोग से वर्ष -2021 में भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन चार साल की अवधि बीत जाने के बावजूद इसका कार्य लटका हुआ है। शुक्रवार सुबह जिलाधिकारी सविन बंसल ने निर्माणाधीन आरओबी का औचक निरीक्षण किया और ठेकेदार को अगस्त-2026 तक हर हाल में निर्माण कार्य पूरा करने के निर्देश दिए।
राज्य सरकार की इस अतिमहत्वकांक्षी परियोजना का काम पूरा होने के बाद हरिद्वार बाईपास, कारगी रोड और इससे जुड़े क्षेत्र के लोगों को प्रिंस चौक, हरिद्वार रोड या राजपुर रोड की तरफ जाने के लिए सहारनपुर रोड होते हुए नहीं जाना पड़ेगा। आरओबी के जरिये सीधे रेसकोर्स और फिर प्रिंस चौक या हरिद्वार रोड की तरफ निकला जा सकेगा।
ठेकेदारों की लापरवाही के कारण परियोजना का काम अब तक अधूरा चल रहा है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने शुक्रवार को मौके पर पहुंचकर कार्यों का निरीक्षण किया और कार्यदायी संस्था/ठेकेदार की सुस्त चाल पर जमकर फटकार लगाई। डीएम ने साफ कह दिया कि यह परियोजना मुख्यमंत्री की प्राथमिकता में है, इसमें देरी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
निरीक्षण के दौरान डीएम ने चेतावनीभरे लहजे में कहा कि शहरवासियों को अधूरी परियोजना की वजह से लगातार जाम और परेशानी झेलनी पड़ रही है। यह लापरवाही और ढिलाई स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कार्यदायी संस्था को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया कि निर्माण कार्य को हर हाल में तय समयसीमा में पूरा किया जाए, वरना जिम्मेदार अधिकारियों और संस्था को सीधे जवाबदेह ठहराया जाएगा।
12 साल से चल रहा इंतजार
भंडारीबाग रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) के निर्माण का सपना वर्ष 2013 में देखा गया था, लेकिन शिलान्यास वर्ष 2021 में हुआ। धरातल पर काम में आगे बढ़ाने में आरंभ से ही लेटलतीफी देखने को मिली। निर्माण कार्य आठ माह के विलंब से किया जा सका। जिसके चलते इसकी दो डेडलाइन मार्च 2023 और मार्च 2024 में बीत चुकी थी। अभी तक सिर्फ भंडारी बाग के छोर पर आरोओबी आकार ले सका है। रेसकोर्स के छोर पर सिर्फ पिलर ही खड़े किए जा सके हैं।
लेटलतीफी पर ईपीआइएल को किया बाहर
परियोजना में बजट की कमी नहीं रही और न ही अन्य संसाधनों की। कमी रही आपसी समन्वय की। क्योंकि, निर्माण का जिम्मा भारत सरकारी की जिस कंपनी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स इंडिया लिमिटेड (ईपीआइएल) को दिया गया था, उसने अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय बनकर काम में तेजी लाने के लिए अपेक्षित प्रयास किए ही नहीं। क्योंकि, रेल लाइन के ऊपर के हिस्से पर पुल को जोड़ने का काम रेलवे को करवाना है।
इसके लिए रेलवे से अनुमति लेकर आपसी तालमेल से कार्य की गति बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन उसने यह काम भी नोडल एजेंसी लोनिवि के सिर मढ़ दिया। यही कारण रहा कि रेलवे से डिजाइन पास करवाने में भी दो साल का समय लग गया। रेलवे से करीब दो साल पहले ही अनुमति मांग ली थी और लाइनों की शिफ्टिंग आदि के लिए ढाई करोड़ रुपये भी जमा करा दिए थे।
हालांकि, जब अगस्त 2024 में डिजाइन को स्वीकृति मिली तो इसके बाद भी धरातल पर अपेक्षित तेजी नजर नहीं आई। परियोजना में लेटलतीफी को देखते हुए ईपीआइएल को जनवरी 2025 में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। वहीं, मार्च में नई कंपनी का चयन किया गया। हालांकि, विलंब के कारण परियोजना की लागत 12.5 करोड़ रुपए बढ़ गई।