देहरादून के बोर्डिंग स्कूलों में लुट रही मासूमों की ”अस्मत”, बच्‍चों की सुरक्षा पर उठे सवाल

 

देहरादून । दून के पटेलनगर स्थित विशेष बच्चों के एक बोर्डिंग स्कूल में दो बच्चों के यौन शोषण की घटना ने बदलते शैक्षिक माहौल व स्कूलों की प्राथमिकताओं को लेकर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अभी पिछले साल ही शहर के डालनवाला स्थित देश के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में छात्र के यौन शोषण का मामला सामने आने के बाद शासन-प्रशासन निजी व बोर्डिंग स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर नियम कड़े करने का दावा कर रहे थे, लेकिन कुछ ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति अब पटेलनगर क्षेत्र के एक स्कूल में फिर हो गई।

यौन शोषण की इन घटनाओं में बड़ी समानता यह भी रही कि स्कूल में प्रबंधन की तरफ से कार्रवाई की पहल करने के बजाए, उसे दबाने के प्रयास अधिक किए गए।

दून शहर को एक दौर में स्कूलों की राजधानी कहा जाता था और स्कूल प्रबंधन की प्राथमिकता में फीस से कहीं अधिक बच्चों को बेहतर शैक्षिक माहौल देना होता था। समय के साथ एजुकेशन हब का आकार बड़ा हुआ और नए-नए स्कूल खुल गए। भौतिकवादी युग में ऐसे स्कूलों ने महंगी फीस व पांच सितारा रहन-सहन को ही अधिक तव्वजो दी।

इसका नुकसान यह हुआ कि शैक्षिक माहौल बदलता चला गया और सुरक्षा के नाम पर इनकी ऊंची दीवारें ही अधिक नजर आने लगीं। छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के लिहाज से ऐसे महंगे और पांच सितारा स्कूलों की व्यवस्थाएं पुख्ता हैं भी या नहीं, यह पूछने की हिम्मत हमारा सरकारी सिस्टम कभी जुटा नहीं पाया। हां, यह बात अलग है कि ऐसे मामले भी तब सामने आते हैं, जब बात स्कूल प्रबंधन के हाथ से निकल जाती है।

कहने को तो स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा को लेकर सरकार ने कई नियम बनाए हैं, मगर इसका पालन करना या न करना, पूरी तरह स्कूल प्रबंधन के हाथ में होता है। बच्चों के बेहतर भविष्य की खातिर अभिभावक भी अधिक हस्तक्षेप नहीं कर पाते। नियमों के आइने में देखें तो बहुत कम ही स्कूल ऐसे होंगे, जहां पैरेंट्स-टीचर-स्टूडेंट्स की कमेटी बनी हुई होगी।

पाेक्सो कमेटी बनाना अनिवार्य

बाल अपराध व यौन शोषण की घटनाओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के क्रम में पोक्सो अधिनियम के तहत सभी स्कूलों में एक इंटरनल कमेटी का गठन करने की अनिवार्यता है। यही नहीं, कमेटी की जानकारी स्कूलों को अपनी वेबसाइट पर भी देने की बाध्यता भी है।

स्थानीय पुलिस को भी इस बात की जिम्मेदारी दी गई है कि वह संबंधित स्कूलों की समय-समय पर खबर लेती रहे। जबकि, बड़ी सच्चाई यह भी है कि हमारी पुलिस के पास कभी इतना साहस रहा ही नहीं कि वह ऐसे नामी स्कूलों के प्रबंधन से सुरक्षा को लेकर कोई सवाल पूछ सके। ताजा घटना से अगर सबक नहीं लिया गया तो ऐसे प्रकरण सामने आते रहेंगे और एजुकेशन हब की छवि इसी तरह तार-तार होती रहेगी।

स्कूल में बच्चों की सुरक्षा पर सवाल

जिस बोर्डिंग स्कूलों में अभिभावक अपने बच्चों को सुरक्षित समझकर छोड़ रहे हैं, वहां न केवल उनका भविष्य तबाह हो रहा, बल्कि उनकी सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बोर्डिंग स्कूलों में जिस तरह से प्रबंधन अपराध को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। अभिभावक अपने बच्चों का बेहतर भविष्य बनाने के लिए बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ाते हैं, ताकि उन्हें पढ़ाई का माहौल मिले और स्कूल प्रबंधन बच्चों को पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान करे, लेकिन स्कूल प्रबंधन सिर्फ मोटी फीस वसूलने तक अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर डाल रहे।

तुरंत देनी चाहिए पुलिस को सूचना

बोर्डिंग या निजी स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार स्कूल प्रबंधन को ऐसे संगीन मामलों में अभिभावक व पुलिस को तत्काल सूचित करना चाहिए, साथ ही आरोपित के विरुद्ध भी स्कूल स्तर पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए। …लेकिन प्रबंधन अपनी सारी जिम्मेदारी दरकिनार करते हुए उल्टा पीड़ित पक्ष को ही धमकाने में लग जाते हैं। पिछले सभी मामलों में देखा गया कि पीड़ित छात्र या छात्रा ने अपने अभिभावक या किसी रिश्तेदार को सूचित किया, तब मामलों में कार्रवाई हो पाई।

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