देहरादून: मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित जल पीने से हुई दुखद घटना ने उत्तराखंड को भी सोचने पर विवश कर दिया है। पेयजल आपूर्ति का जिम्मा संभालने वाले उत्तराखंड जल संस्थान के अधीन पेयजल लाइनों को देखें तो इनकी लंबाई 90044.21 किलोमीटर है।
इसमें भी 30 प्रतिशत पेयजल लाइनें ऐसी हैं, जो 30 से 40 साल पुरानी हैं। उस पर तुर्रा यह कि पेयजल लाइनों के आसपास से सीवेज लाइन और नालियां भी गुजर रही हैं। ऐसे में पेयजल लाइन में लीकेज होने पर दिक्कत खड़ी हो सकती है। इस सबके दृष्टिगत ही अब पेयजल लाइनों के आडिट का निश्चय किया गया है। साथ ही लाइनों की निगरानी व्यवस्था को भी पुख्ता किया जा रहा है
जल संस्थान से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उसके पास वर्तमान में नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों की 3864 पेयजल योजनाएं हैं। इनसे प्रतिदिन 1322.86 एमएलडी (एलएलडी) पेयजल का उत्पादन होता है।
इस पानी को 51,248.99 मुख्य और 38,795.22 किमी लंबी वितरण लाइनों के माध्यम से घरों तक पहुंचाया जाता है। तय व्यवस्था के अनुसार पेयजल निगम समेत अन्य एजेंसियां पेयजल योजनाओं का निर्माण करती हैं और फिर इन्हें जल संस्थान को हस्तांतरित करती हैं।
पेयजल लाइनों का निर्माण अगले 30 साल को ध्यान में रखकर किया जाता है। इस दृष्टि से देखें तो राज्य के देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर समेत अन्य जिलों के शहरों के कुछेक क्षेत्रों में अभी भी 30 से 40 साल पुरानी और एकाध जगह अंग्रेजों के समय डाली गई पेयजल लाइनों से आपूर्ति हो रही है।
यद्यपि, पेयजल लाइनों को बदलने और नई लाइनें बिछाने का काम भी समय-समय पर विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से होता आ रहा है, लेकिन कुछ शहरों में घनी आबादी वाले ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां इन लाइनों को बदलना या नई डालना किसी चुनौती से कम नहीं है।
जर्जर हो चुकी पेयजल लाइनों में लीकेज की दिक्कत अधिक आती है। इसके अलावा सीवेज लाइन के निर्माण अथवा विभिन्न निर्माण कार्यों के चलते सीवेज व पेयजल लाइन क्षतिग्रस्त होने की दशा में घरों में दूषित जलापूर्ति की आशंका बढ़ जाती है।
पूर्व में ऐसे मामले विभिन्न शहरी क्षेत्रों में सामने आ चुके हैं। ऐसे में दूषित जलापूर्ति का खतरा राज्य में भी कम नहीं है। इंदौर की घटना के बाद सरकार ने भी इससे सबक लिया है। पेयजल लाइनों में लीकेज न हो, इसके दृष्टिगत प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। जल संस्थान ने इस दिशा में कसरत प्रारंभ कर दी गई है।