कम उम्र में बढ़ रही भूलने की बीमारी, फोकस करना भी मुश्किल; डाक्टर बोले- जीवनशैली में बदलाव जरूरी

देहरादून: घर से बाहर सामान लेने जाते हैं तो भूल जाना कि लेना क्या है। किसी से बहुत दिनों बाद मिलने पर नाम याद न आना। एक कमरे से दूसरे में आते ही पता नहीं चल पाना कि क्यों आए थे।

कुछ पुरानी बातों को याद दिलाने पर याद न आना। कुछ इस तरह भूलने की बीमारी अब बुजुर्गों में नहीं बल्कि युवा वर्ग में होने लगी है

राजकीय दून मेडिकल कालेज अस्पताल और जिला अस्पताल के मनोरोग विभाग की ओपीडी में भी हर तीसरा युवा इसी तरह की शिकायत लेकर पहुंच रहा है। डाक्टरों का कहना है कि जवानी में भूलने के पीछे तनाव व मल्टी टास्किंग सबसे बड़ा कारण है।

पोषण युक्त भोजन न लेना और अधिक समय तक स्क्रीन टाइम हमारे दिमाग की नसों में तनाव बढ़ा देता है।इससे कम उम्र में ही भूलने की बीमारी बढ़ती है। हालांकि, यह डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी नहीं है।

कम उम्र में ही भूलने की बीमारी बढ़ने से स्वभाव, बातचीत करने का तरीका भी आम लोगों से भिन्न हो रहा है। व्यवहार में भारी बदलाव से अभिभावक परेशान हैं।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि तनाव, नींद की कमी, खराब आहार और कुछ तंत्रिका संबंधी विकार इसके कारण हो सकते हैं। यदि कोई बार-बार चीजें भूल रहा है और यह उसके दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है तो ऐसे में समय पर उपचार जरूरी है।

दून मेडिकल कालेज अस्पताल की मनोरोग विभाग की ओपीडी में हर दूसरा व तीसरा बोलता है कि भूलने की बीमारी है। यह इसलिए हो रहा है कि हमारी जीवनशैली बहुत व्यस्त हो गई है। हम एक साथ बहुत सारा काम करना चाहते हैं और इसका सबसे बड़ा कारण है मोबाइल।

किसी बात को दर्ज नहीं कर पाता दिमाग तो होती है परेशानी

दून मेडिकल कालेज की मनोरोग विभागाध्यक्ष डा. जया नवानी बताती हैं कि भूलने की बीमारी अधिकांश अधिक उम्र 60 अथवा 65 के बाद होती है। जिसे हम डिमेंशिया कहते हैं। अटेंशन कसंट्रेशन रजिस्ट्रेशन, शार्ट टर्न मेमोरी और लांग टर्न मेमोरी यादाश्त बनाने के कारण हैं। एक दिमाग एक समय में पांच से सात चीजें रिकार्ड कर सकता है।

यदि कोई काम करते हुए दूसरा काम आ जाए या बात हो जाए तो अक्सर उसे भूल जाते हैं। ऐसे में लगता है कि भूलने की बीमारी हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि हमारा दिमाग अक्सर एक काम के दौरान दूसरी बातों को दर्ज नहीं कर पाता है। जब हम डिप्रेशन में होते हैं तो अटेंशन व कंसंट्रेशन कम हो जाता है। जिससे हमारा दिमाग सामान्य की तरह काम नहीं कर पाता।

देर रात तक जागना और शारीरिक गतिविधि की कमी भी कारण

जिला अस्पताल (कोरोनेशन) की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. निशा सिंगला का कहना है कि आजकल कम उम्र में भूलने की समस्या चिंता का विषय बन गई है। उनकी ओपीडी में महीनेभर में औसतन 10-15 ऐसे मरीज आते हैं, जिन्हें वास्तविक डिमेंशिया होता है।

लेकिन, उससे भी ज्यादा, लगभग 30-40 लोग भूलने की शिकायत लेकर आते हैं। जिनका कारण डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की कमी अथवा अत्यधिक तनाव होता है। कम उम्र में भूलने की प्रवृत्ति जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं के कारण भी देखी जा रही है।

जैसे असंतुलित आहार, देर रात तक जागना, स्क्रीन टाइम का अधिक होना, नशे की आदत और शारीरिक गतिविधि की कमी। वास्तविक डिमेंशिया के मामलों में न्यूरोलाजिकल या अन्य मेडिकल कारण जिम्मेदार होते हैं, जबकि बाकी अधिकतर मामलों में मनोविज्ञानी और जीवनशैली प्रमुख रहते हैं।

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