Dehradun Metro: 7 साल का सफर, 80 करोड़ खर्च और नतीजा सिफर…पटरी से उतरने लगी नियो मेट्रो परियोजना

 

देहरादून। राजधानी में नियो मेट्रो परियोजना धरातल पर उतरने से पहले ही बेपटरी होती दिख रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो मेट्रो रेल परियोजना की फाइल बंद होती दिख रही है। क्योंकि, उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन (यूकेएमआरसी) से एक-एक कर अधिकारियों की छुट्टी होती जा रही है।

महाप्रबंधक (वित्त), अपर महाप्रबंधक और डीजीएम सिविल का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद अब कारपोरेशन के संचार की अहम कड़ी जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) को भी सेवा विस्तार नहीं दिया जा रहा है। वह सोमवार को विदा लेंगे।

टीम मेट्रो के खाली होने के क्रम में स्वयं प्रबंध निदेशक जितेंद्र त्यागी तक खड़े हैं। यह भी व्यक्ति हैं, जिन्होंने देहरादून में मेट्रो परियोजना की शुरुआत की और तमाम अध्ययन के बाद डीपीआर तैयार करवाई। प्रबंध निदेशक के सेवा विस्तार को लेकर भी कोई सुगबुगाहट नजर नहीं आ रही है। दूसरी तरफ मेट्रो रेल कारपोरेशन के महाप्रबंधक (सिविल) सुनील त्यागी का कार्यकाल भी नौ जनवरी को समाप्त हो रहा है। इन्हें सेवा विस्तार देने को लेकर प्रबंध निदेशक ने कोई हामी नहीं भरी है।

मेट्रो के बेपटरी होने की कहानी यहीं खत्म होती नहीं दिख रही। फरवरी माह में लैंड आफिसर और लेखपाल का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है। यह स्थिति बताती है कि मेट्रो के भविष्य पर निरंतर प्रश्नचिह्न खड़ा होता जा रहा है।

सात साल का सफर, 80 करोड़ खर्च और नतीजा सिफर

मेट्रो परियोजना के सफर को करीब सात साल हो चुके हैं। तब से अब तक सात साल का सफर हो चुका है, लेकिन मेट्रो सफर अभी भी भौतिक प्रगति के रूप में शून्य है। इस दौरान मेट्रो के अलग अलग रूप पर कसरत करने के बाद अंतिम रूप से नियो मेट्रो की डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार की गई। आठ जनवरी 2022 को नियो मेट्रो की डीपीआर को राज्य कैबिनेट से पास करने के बाद 12 जनवरी को केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए भेज दिया गया था।

वित्त विभाग नहीं दिखा पा रहा साहस

केंद्र सरकार से निराशा हाथ लगने के बाद राज्य सरकार ने तय किया था कि मेट्रो के लिए खर्च अपने स्रोतों से वहन किया जाएगा। इसके लिए पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (पीआइबी) के समक्ष प्रस्ताव को रखने पर सहमति बनी। अगस्त 2024 में पीआइबी के समक्ष प्रस्तुतीकरण भी दिया गया। ताकि वित्त विभाग की सभी शंका का समाधान कर दिया जाए। जिसमें कहा गया कि बजट का 40 प्रतिशत भाग सरकार वहन करेगी और 60 प्रतिशत का इंतजाम ऋण के माध्यम से किया जाएगा। उस बैठक में कंसल्टेंट कंपनी मैकेंजी कंपनी से डीपीआर का थर्ड पार्टी परीक्षण कराने का भी निर्णय लिया गया। लेकिन, परीक्षण पर अभी तस्वीर साफ नहीं की जा सकी और फाइल भी वित्त से आगे नहीं सरक पाई।

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