मरहम के बजाय मिलीं ठोकरे: हाल-ए-दून अस्पताल…घायल मासूम को गोद में लिए भटकती रही मां, पसीजा नहीं किसी का दिल

 

देहरादून

छत से गिरकर घायल हुए तीन साल बच्चे को लेकर परिवार सहारनपुर से दून अस्पताल लेकर आए थे। दून अस्पताल में मासूम को गोद में उठाए सर्द रात में मां भटकती रही, लेकिन डॉक्टरों को दिल नहीं पसीजे।

दून अस्पताल में मंगलवार रात एक मां तीन वर्ष के घायल मासूम को लेकर इधर-उधर भटकती रही, लेकिन उपचार तो दूर मासूम को भर्ती तक नहीं किया गया। अस्पताल प्रबंधन कभी बाहर से जांच करवाने तो कभी चिकित्सक के मौजूद न होने की बात कहते रहे। करीब 17 घंटे के बाद बुधवार दोपहर बाद मासूम को भर्ती किया गया। इससे दून अस्पताल की व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार मंगलवार को एक तीन वर्ष का मासूम छत से गिरकर घायल हो गया। परिजन सहारनपुर से उसे दून अस्पताल लाए। परिजन जब इमरजेंसी पहुंचे तो स्टाफ ने जांचें पूरी होने के बाद भर्ती करने की बात कही। चिकित्सक के मुताबिक बच्चे की अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन के अलावा कई जांचें होनी थीं।

तीमारदारों ने अस्पताल में जांच करवाने की जानकारी ली तो पता चला कि कई जांचें बाहर से करवानी पड़ेंगी। मासूम की मां आयशा चिकित्सकों से बच्चे को भर्ती करने के लिए गिड़गिड़ाती रही, लेकिन धरती के भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों का दिल नहीं पसीजा।

करीब दो बजे घायल मासूम को भर्ती किया गया

मां बच्चे को गोद में उठाए पूरी रात अस्पताल की सीढि़यों पर बैठी रही। जैसे-तैसे सुबह हुई और मासूम की बाहर से जांचें कराई गईं। इसके बाद भी चिकित्सक बच्चे को भर्ती करने के लिए तैयार नहीं थे। परिजनों ने जब हंगामा किया तो बुधवार दोपहर करीब दो बजे घायल मासूम को भर्ती किया गया।

मासूम की बिगड़ती हालत तो कौन होता जिम्मेदार

दून अस्पताल में करीब 17 घंटे तक घायल मासूम के इलाज के लिए परिजन भटकते रहे। इस दौरान अगर बच्चे की हालत बिगड़ती तो इसका जिम्मेदार कौन होता, यह एक बड़ा सवाल है। दून अस्पताल की अव्यवस्थाओं की जब पोल खुल रही है तो अधिकारी इसे सामान्य घटना का रूप देने में जुटे हैं। जबकि, उन्हें कमियों को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए।

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