देहरादून
दिल्ली-देहरादून राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना के तहत एलिवेटेड का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए करीब 7000 पेड़ों को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा में काट दिया गया। इतनी संख्या में पेड़ों के काटने पर पहली बार दून में समाजसेवी संगठनों ने इसका विरोध किया था।
दून की वादियों में हरियाली पर संकट नया नहीं है। न ही इसे बचाने की जंग नई है। यहां विकास के साथ ही हरे पेड़ों के कटान का सिलसिला चलता रहा है। शुरुआत में कम संख्या में पेड़ कटे, लेकिन जैसे-जैसे विकास की बड़ी परियोजनाएं खासकर राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण ने गति पकड़ी तो पेड़ों का कटान भी बड़ी संख्या में होने लगा।
गणेशपुर से डाटकाली मंदिर तक दिल्ली-देहरादून राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना के तहत एलिवेटेड का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए करीब 7000 पेड़ों को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा में काट दिया गया। इतनी संख्या में पेड़ों के काटने पर पहली बार दून में समाजसेवी संगठनों ने इसका विरोध किया था।
तब आशारोड़ी में जनगीत गाकर पेड़ कटान का जबर्दस्त विरोध किया गया। पेड़ काट रहे कर्मचारियों को रोका गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच नोकझोंक भी हुई। काफी प्रयासों के बाद भी पेड़ों के कटान को रोकने में कामयाबी नहीं मिली। प्रयास बेशक नाकाम रहे, लेकिन पेड़ों को बचाने का जज्बा दून के लोगों के अंदर फलता-फूलता रहा।
यही जज्बा एक बार फिर तब निकलकर सामने आया जब खलंगा और कैंट रोड पर पेड़ों के कटान की सूचना मिली। इस बार पर्यावरण प्रेमियों ने झुकने के बजाय अपने संकल्प पर अडिग रहने की ठानी। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार को अपने फैसले को बदलना पड़ा।