शुगर लेवल 70 से नीचे जाने पर क्या करें? हर डायबिटीज मरीज को पता होना चाहिए ’15-15 का यह अचूक नियम’

नई दिल्ली। ब्लड शुगर का थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे होना सामान्य हो सकता है, पर बार-बार या बहुत अधिक उतार-चढ़ाव होना नई मुश्किलें पैदा कर सकता है। इसलिए डॉ. अंबरीश मित्थल (चेयरमैन, एंडोक्राइनोलाजी एंड डायबिटीज, मैक्स हेल्थकेयर, दिल्ली) कहते हैं कि केवल ब्लड शुगर को कम करना ही नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित सीमा में बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण हैं

क्योंकि ब्लड शुगर का बहुत कम हो जाना यानी हाइपोग्लाइसीमिया या बहुत अधिक हो जाना यानी हाइपरग्लाइसीमिया, दोनों ही परिस्थितियां डायबिटीज से जूझ रहे व्यक्ति के लिए जोखिम भरी हो सकती हैं।

आमतौर पर 70 एमजी/डीएल या उससे कम शुगर स्तर को हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है, इसके पीछे अनेक जैसे कारण हो सकते हैं, जैसे- इंसुलिन की जरूरत से अधिक मात्रा ले लेना, भोजन में ज्यादा अंतराल होना, कभी-कभी सामान्य से अधिक शारीरिक गतिविधि/ व्यायाम कर लेना।

ऐसी स्थिति में अगर अचानक घबराहट, बेचैनी, पसीना या कंपकंपी महसूस हो और शुगर 70 एमजी/डीएल से कम हो जाए, तो उपचार के लिए लगभग 15 ग्राम तेजी से असर करने वाला कार्बोहाइड्रेट लें, जैसे 100–150 मिली नियमित मीठा पेय या ग्लूकोज। इसके 15 मिनट बाद दोबारा शुगर जांचें। अगर यह अभी भी 70 एमजी/डीएल से कम है, तो 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट दोबारा लें। इसे ‘रूल आफ 15-15’ कहते हैं।

इसी तरह, व्यायाम से पहले अगर ब्लड शुगर का स्तर कम है तो एक छोटा सा कार्बोहाइड्रेट जैसे एक फल या एक कप दूध आदि ले सकते हैं। व्यायाम करने की समय सीमा और व्यायाम के प्रकार के आधार पर विशेष रूप से दवाएं या इंसुलिन की डोज में भी बदलाव करना चाहिए। भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करने से बचें, विशेष रूप से इंसुलिन लेने वाले। इससे हाइपोग्लाइसीमिया का जोखिम कम होता है

अगर शुगर बढ़ जाए तो क्या है उपाय

दवा या इंसुलिन की निर्धारित मात्रा नहीं लेने, अधिक कार्बोहाइड्रेट के सेवन या तनाव या पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण ब्लड शुगर में अचानक वृद्धि हो सकती है। अगर शुगर 250एमजी/ डीएल या उससे अधिक हो और बहुत ज्यादा प्यास लगे, बार-बार यूरिन आए या उल्टी होने, सांस लेने में परेशानी या अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण महसूस हों, तो तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए, ताकि उचित सलाह के आधार पर आपकी दवाएं और इंसुलिन की मात्रा तय की जा सके।

इससे बचाव के लिए भोजन में अधिक फाइबर और पर्याप्त प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। ब्लड शुगर अधिक बढ़ जाने पर इंसुलिन की अतिरिक्त खुराक ली जा सकती है। अगर तनाव या नींद के कारण ब्लड शुगर बढ़ रहा है, तो उसके लिए दिनचर्या में उचित प्रबंधन करें। हमेशा ध्यान रखें कि नियमित मॉनिटरिंग, संतुलित आहार, दवाओं का सही उपयोग और स्वस्थ जीवनशैली ही ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक है।

डायबिटीज को मैनेज करने का सीखें तरीका

डायबिटीज को मैनेज करने के लिए ब्लड शुगर की नियमित जांच बेहद जरूरी है। इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि हमारी दवाइयां, खानपान, शारीरिक गतिविधि, नींद और तनाव ब्लड शुगर को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं और कहां बदलाव की जरूरत है। डायबिटीज में नियमित दवा लेने जितना ही खान-पान का ध्यान रखना और ब्लड शुगर की निगरानी करना भी महत्वपूर्ण है। इसके लिए कुछ बातों का हमेशा खयाल रखें-

खानपान के स्तर पर सतर्कता

ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव का एक बड़ा कारण हमारा भोजन है। भोजन की मात्रा, उसकी गुणवत्ता और भोजन के बीच का अंतराल, तीनों ही ब्लड ग्लूकोज को प्रभावित कर सकते हैं। बहुत अधिक मात्रा में आसानी से पचने वाले या रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट लेने से भोजन के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है।

वहीं, भोजन को लंबे समय तक टालना या पर्याप्त भोजन न लेना, विशेष रूप से इंसुलिन या कुछ विशेष दवाइयां लेने वाले मरीजों में, ब्लड शुगर के अत्यधिक कम हो जाने का जोखिम रहता है, इसलिए नियंत्रित ब्लड शुगर के लिए संतुलित आहार जरूरी है।

भोजन में उचित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, विशेष रूप से साबुत अनाज और अन्य उच्च-फाइबर स्रोतों से मिलने वाले कांप्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त प्रोटीन, फाइबर और स्वस्थ वसा का संतुलित समावेश होना चाहिए। किसी एक खाद्य पदार्थ से अपने आपको वंचित रखने के बजाए भोजन की मात्रा, गुणवत्ता और पूरे दिन के ब्लड शुगर के पैटर्न पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।

दवाइयां और इंसुलिन का रहे खयाल

बिना रीडिंग पर ध्यान दिए लगातार इंसुलिन की डोज में बदलाव करना हाइपोग्लाइसीमिया या बहुत अधिक ब्लड शुगर (हाइपरग्लिसिमा) का कारण बन सकता है, इसलिए इंसुलिन की डोज में बदलाव ब्लड ग्लूकोज को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया डरावना हो सकता है, इसलिए ऐसे मरीजों के लिए शुरुआती लक्षणों की पहचान और उपचार की जानकारी होना बहुत जरूरी है। केवल इंसुलिन की डोज ही महत्वपूर्ण नहीं है। इंसुलिन लगाने की सही तकनीक, इंजेक्शन की साइट को बदलते रहना, इंसुलिन को एक संतुलित तापमान में रखना यह सभी बहुत मायने रखता है।

ब्लड शुगर बढ़ने या घटने पर हमेशा केवल इंसुलिन की डोज को बढ़ाना या घटाना ही समाधान नहीं होता। सिर्फ इंसुलिन ही नहीं डायबिटीज के उपचार के लिए ली जाने वाली विभिन्न दवाइयां भी कई प्रकार से हमारे शरीर में शुगर को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।

कुछ दवाएं इंसुलिन के सेक्रेशन प्रभाव को बढ़ाती हैं, कुछ खाने के बाद बढ़ने वाली शुगर को कम करने में सहायक होती हैं, कुछ यूरिन के माध्यम से शुगर को शरीर से बाहर निकालती है, इसलिए ब्लड शुगर की निरंतर जांच हमें इन दवाइयों में बदलाव के आवश्यकता के बारे में भी उचित समय पर सचेत कर सकता है।

तनाव का भी असर होता है ब्लड शुगर पर

जब शरीर अत्यधिक तनाव की स्थिति में होता है, तो कार्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोंस का स्तर बढ़ सकता है। इससे शरीर में ग्लूकोज का प्रोडक्शन और रिलीज बढ़ सकता है और कुछ लोगों में ब्लड शुगर अचानक बढ़ सकता है। यदि बिना किसी स्पष्ट बदलाव के ब्लड शुगर बार-बार बढ़ रहा है, तो केवल भोजन और दवाइयों पर ही नहीं, बल्कि तनाव के स्तर पर भी ध्यान देना चाहिए।

नींद खराब है तो भी मुसीबत

पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद भी डायबिटीज मैनेजमेंट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। नींद की कमी शरीर के तनाव और भूख से जुड़े हार्मोंस को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण कुछ लोगों में भूख बढ़ सकती है, अनावश्यक खाने की इच्छा हो सकती है और शारीरिक गतिविधि भी कम हो सकती है। ये सभी चीजें अप्रत्यक्ष रूप से ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए पर्याप्त नींद को दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है।

नियमित निगरानी है महत्वपूर्ण

डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए केवल एक-दो ब्लड शुगर रीडिंग देखना पर्याप्त नहीं होता। समय के साथ आने वाले पैटर्न को समझना अधिक महत्वपूर्ण है- किस समय शुगर बढ़ती है, कब कम होती है, भोजन, व्यायाम, तनाव, नींद या दवा का उस पर क्या प्रभाव पड़ता है।

अपनी ब्लड शुगर रीडिंग के आधार पर भोजन की मात्रा और गुणवत्ता पर ध्यान दें, नियमित शारीरिक गतिविधि करें, पर्याप्त नींद लें और तनाव को पहचानकर उसे कम करने के तरीके अपनाएं। याद रखें ब्लड शुगर में होने वाले उतार-चढ़ाव को केवल एक समस्या की तरह देखने के बजाय उसके पीछे के कारण को समझना जरूरी है। नियमित मानिटरिंग हमें समस्या को पहचानने, उसके कारण को समझने और सही समय पर सही कदम उठाने का अवसर देती है

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