*देहरादून, 04 अक्टूबर 2026, रविवार।* चखुवाला स्थित श्री शिव राम मंदिर में पितरों की मुक्ति हेतु चल रहे श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान रविवार को राजा परीक्षित की मनोदशा और मृत्यु को लेकर विशेष ज्ञान की वर्षा हुई।
व्यास पीठ पर विराजमान पूज्य कथा व्यास आचार्य सुनील ममगाईं जी महाराज ने कथा करते हुए कहा कि जब राजा परीक्षित को श्राप मिला कि सात दिन बाद तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु होगी, तो राजा की मनोदशा विचलित हो गई थी। राज-पाट, वैभव सब होते हुए भी मृत्यु का भय उन्हें सताने लगा। तब उन्होंने सब कुछ त्याग कर गंगा किनारे सुखदेव जी की शरण ली।
आचार्य श्री ने कहा कि परीक्षित की यही दशा आज हर मनुष्य की है। हर व्यक्ति जानता है कि मृत्यु निश्चित है, फिर भी वह जीवन भर मोह-माया में उलझा रहता है। जब अंत समय आता है तब उसे अपने कर्मों का भान होता है।
भागवत कथा में मौत को लेकर ज्ञान देते हुए उन्होंने कहा कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि आत्मा का एक वस्त्र बदलना है। जो व्यक्ति जीवन भर भगवान का नाम जपता है, भागवत सुनता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता। सुखदेव जी ने राजा परीक्षित को यही समझाया था कि आत्मा अजर-अमर है, मरता तो केवल शरीर है।
उन्होंने कहा कि भागवत कथा हमें जीते-जी मरना सिखाती है, अर्थात अहंकार, लोभ और मोह को त्यागना सिखाती है। यदि मनुष्य प्रतिदिन थोड़ा समय भी भक्ति के लिए निकाले तो उसे मृत्यु के समय घबराहट नहीं, बल्कि शांति की अनुभूति होगी और पितरों को भी इससे मुक्ति मिलती है।