देहरादून। बच्चे के जन्म का पल कभी प्रकृति के भरोसे होता था, अब पहले से तारीख तय हो रही हैं, तो कहीं शुभ घड़ी का इंतजार। जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण से अपने बच्चे के जन्मदिन को जोड़ने की चाहत इसका नया उदाहरण है।
हल्द्वानी में 12 परिवारों ने जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त में प्रसव कराने की इच्छा जताई, जबकि देहरादून के निजी अस्पतालों में 20 से अधिक परिवारों ने आपरेशन के जरिये शुभ संयोग में बच्चे के जन्म का अनुरोध किया।
मुहूर्त की चाह सीजेरियन रेट बढ़ने का अकेला कारण नहीं है, लेकिन राज्य में आपरेशन से प्रसव की लगातार बढ़ती दर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती है।
एक दशक में सीजेरियन प्रसव की दर दोगुनी
निजी अस्पतालों में बच्चों के जन्म के लिए होने वाले सीजेरियन आपरेशन की दर सरकारी अस्पतालों की तुलना में तीन गुने से अधिक है।
राज्य के निजी अस्पतालों में होने वाले प्रसव में 47.7 प्रतिशत सीजेरियन हो रहे हैं, यानी कि निजी अस्पतालों में हर दूसरा प्रसव सीजेरियन से हो रहा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह दर 14.7 प्रतिशत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में एक दशक में सीजेरियन प्रसव की दर लगभग दोगुनी हो चुकी है।
सरकारी अस्पतालों की घटी साख
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट के अनुसार 83.2 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में हुए थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 में बढ़कर 88.9 प्रतिशत हो गए, लेकिन सरकारी संस्थानों में होने वाले प्रसव का हिस्सा 53.3 प्रतिशत से घटकर 49.9 प्रतिशत रह गया। यानी अस्पतालों में प्रसव की पहुंच तो बढ़ी लेकिन निजी अस्पतालों पर निर्भरता भी बढ़ गई है।